सुत बित नारि भवन परिवारा
सुत बित नारि भवन परिवारा
चौपाई ४, दोहा ६१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥ अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥ ४ ॥
अर्थ
पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार--ये जगत में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदय में ऐसा विचारकर हे तात! जागो।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “राम का विलाप, लक्ष्मण का उठना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम के करुण विलाप, हनुमान के लौटने और लक्ष्मण के पुनर्जीवित होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम का विलाप, लक्ष्मण का उठना