जैहउँ अवध कवन मुहु लाई
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई
चौपाई ६, दोहा ६१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥ ६ ॥
अर्थ
स्त्री के लिए प्रिय भाई को खोकर मैं अवध किस मुँह से जाऊँगा? मैं जगत में बदनामी भले ही सह लेता। स्त्री की हानि से विशेष क्षति नहीं है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “राम का विलाप, लक्ष्मण का उठना” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम के करुण विलाप, हनुमान के लौटने और लक्ष्मण के पुनर्जीवित होने का वर्णन है।
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राम का विलाप, लक्ष्मण का उठना