मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी

चौपाई ४, दोहा ६ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी॥ बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई॥ ४ ॥

अर्थ

हे खरारि! मैं वहाँ महीना-दिन तक रहा। वहाँ (उस गुफा से) रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। तब [मैंने समझा कि] उसने बालि को मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिए मैं वहाँ (गुफा के द्वार पर) शिला दे कर भाग आया।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव का दुःख-संवाद, बालि वध की प्रतिज्ञा और सच्चे मित्र के लक्षणों पर श्रीराम का उपदेश का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा