नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई
नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई
चौपाई १, दोहा ६ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई॥ मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥ १ ॥
अर्थ
हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं। हम दोनों में ऐसी प्रीति रही कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हे प्रभो! मय दानव का एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था। वह हमारे गाँव में आया।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव का दुःख-संवाद, बालि वध की प्रतिज्ञा और सच्चे मित्र के लक्षणों पर श्रीराम का उपदेश का वर्णन है।
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सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा