देत लेत मन संक न धरई
देत लेत मन संक न धरई
चौपाई ३, दोहा ७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥ बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥ ३ ॥
अर्थ
देने-लेने में मन में शंका न रखे। बल के अनुमान से सदा हित ही करे। विपत्ति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे। श्रुति कहती है कि संत मित्र के गुण ये हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव का दुःख-संवाद, बालि वध की प्रतिज्ञा और सच्चे मित्र के लक्षणों पर श्रीराम का उपदेश का वर्णन है।
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सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा