जिन्ह कें असि मति सहज न
जिन्ह कें असि मति सहज न
चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥ कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥ २ ॥
अर्थ
जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव का दुःख-संवाद, बालि वध की प्रतिज्ञा और सच्चे मित्र के लक्षणों पर श्रीराम का उपदेश का वर्णन है।
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सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा