आगें कह मृदु बचन बनाई

चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥ जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई॥ ४ ॥

अर्थ

जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है—हे भाई! [इस तरह] जिसका मन साँप की चाल के समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव का दुःख-संवाद, बालि वध की प्रतिज्ञा और सच्चे मित्र के लक्षणों पर श्रीराम का उपदेश का वर्णन है।

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सुग्रीव का दुःख और बालि वध की प्रतिज्ञा