गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी

चौपाई ३, दोहा १८८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥ यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥ ३ ॥

अर्थ

वे पर्वतों और जंगलों में जहाँ-तहाँ अपनी-अपनी सुन्दर सेनाएँ रचकर भर गये। यह सब रुचिर चरित्र मैंने भाषा में कहा। अब वह सुनो जो बीच में छोड़ दिया गया था।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “भगवान का वरदान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भगवान द्वारा रघुकुल में अवतार लेने के वरदान और देवताओं को मिली शांति का वर्णन है।

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भगवान का वरदान