सो दससीस स्वान की नाईं
सो दससीस स्वान की नाईं
चौपाई ५, दोहा २८ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥ इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥ ५ ॥
अर्थ
वही दस सिरवाला रावण कुत्ते की तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई* (चोरी) के लिये चला। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी ! इस प्रकार कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में तेज तथा बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता। * सूना पाकर कुत्ता चुपके-से बर्तन-भाँड़ों में मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है, उसे 'भड़िहाई' कहते हैं।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “श्रीसीता हरण और श्रीसीता विलाप” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा २८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण द्वारा सीताजी का छलपूर्वक हरण और उनका करुण विलाप का वर्णन है।
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श्रीसीता हरण और श्रीसीता विलाप