हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा

चौपाई २, दोहा २९ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा॥ बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही॥ २ ॥

अर्थ

हा लक्ष्मण! तुम्हारा दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया। श्रीजानकीजी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं--[हाय!] प्रभु की कृपा तो बहुत है, परन्तु स्नेही प्रभु दूर रह गये हैं।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “श्रीसीता हरण और श्रीसीता विलाप” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण द्वारा सीताजी का छलपूर्वक हरण और उनका करुण विलाप का वर्णन है।

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श्रीसीता हरण और श्रीसीता विलाप