जप तप ब्रत दम संजम नेमा
जप तप ब्रत दम संजम नेमा
चौपाई २, दोहा ४६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा॥ श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥ २ ॥
अर्थ
वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियम में रत रहते हैं और गुरु, गोविन्द तथा ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणों में निष्कपट प्रेम होता है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संतों के स्वभाव, विनय, दया और सत्संग-भजन की महिमा का वर्णन है।
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संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा