गावहिं सुनहिं सदा मम लीला

चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला॥ मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते॥ ४ ॥

अर्थ

सदा मेरी लीलाओं को गाते-सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरों के हित में लगे रहनेवाले होते हैं। हे मुनि! सुनो, संतों के जितने गुण हैं, उनको सरस्वती और वेद भी नहीं कह सकते।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संतों के स्वभाव, विनय, दया और सत्संग-भजन की महिमा का वर्णन है।

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संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा