कहि सक न सारद सेष नारद
कहि सक न सारद सेष नारद
छन्द, दोहा ४६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे। अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥ सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए। ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥
अर्थ
'शेष और शारदा भी नहीं कह सकते' यह सुनते ही नारदजी ने श्रीरामजी के चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभु ने इस प्रकार अपने श्रीमुख से अपने भक्तों के गुण कहे। भगवान् के चरणों में बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मपुर को चले गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल हरि के रंग में रँग गये हैं॥
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा” प्रकरण का छन्द, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संतों के स्वभाव, विनय, दया और सत्संग-भजन की महिमा का वर्णन है।
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संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा