गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह
दोहा ४५ · अरण्यकाण्ड
दोहा पाठ
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह। तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥ ४५ ॥
अर्थ
गुणों के घर, संसार के दुःखों से रहित और संदेहों से सर्वथा छूटे हुए होते हैं। मेरे चरणकमलों को छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा” प्रकरण का दोहा ४५ है। इस प्रकरण में संतों के स्वभाव, विनय, दया और सत्संग-भजन की महिमा का वर्णन है।
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संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा