षट बिकार जित अनघ अकामा

चौपाई ४, दोहा ४५ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥ अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥ ४ ॥

अर्थ

वे संत [काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर--इन] छः विकारों को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिंचन (सर्वत्यागी), बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान, योगी,।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संतों के स्वभाव, विनय, दया और सत्संग-भजन की महिमा का वर्णन है।

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संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा