निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं
चौपाई १, दोहा ४६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं॥ सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती॥ १ ॥
अर्थ
कानों से अपने गुण सुनने में सकुचाते हैं, दूसरों के गुण सुनने से विशेष हर्षित होते हैं। सम और शीतल हैं, नीति का कभी त्याग नहीं करते। सरल स्वभाव होते हैं और सभी से प्रेम रखते हैं।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संतों के स्वभाव, विनय, दया और सत्संग-भजन की महिमा का वर्णन है।
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संतों के लक्षण और सत्संग प्रेरणा