उभय बीच श्री सोहइ कैसी

चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥ सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानि देहिं बर बाटा॥ २ ॥

अर्थ

दोनों के बीच में श्रीजानकीजी कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया हो। नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ, सभी अपने स्वामी को पहचानकर सुन्दर रास्ता दे देते हैं।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “विराध वध और शरभंग प्रसंग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा विराध वध और शरभंग मुनि को दर्शन देकर परम गति प्रदान करने का वर्णन है।

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विराध वध और शरभंग प्रसंग