सो कछु देव न मोहि निहोरा
सो कछु देव न मोहि निहोरा
चौपाई ३, दोहा ८ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा॥ तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी॥ ३ ॥
अर्थ
हे देव! यह कुछ मुझ पर आपका एहसान नहीं है। हे भक्त-मनचोर। ऐसा करके आपने अपने प्रण की ही रक्षा की है। अब इस दीन के कल्याण के लिये तब तक यहाँ ठहरिये, जब तक मैं शरीर छोड़कर आपसे [आपके धाम में न] मिलूँ।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “विराध वध और शरभंग प्रसंग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा विराध वध और शरभंग मुनि को दर्शन देकर परम गति प्रदान करने का वर्णन है।
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विराध वध और शरभंग प्रसंग