जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा
चौपाई ४, दोहा ८ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥ एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥ ४ ॥
अर्थ
योग, यज्ञ, जप, तप, जो कुछ व्रत आदि भी मुनि ने किया था, सब प्रभु को समर्पण करके बदले में भक्ति का वरदान ले लिया। इस प्रकार [दुर्लभ भक्ति प्राप्त करके फिर] मुनि शरभंगजी हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उस पर जा बैठे।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “विराध वध और शरभंग प्रसंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा विराध वध और शरभंग मुनि को दर्शन देकर परम गति प्रदान करने का वर्णन है।
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विराध वध और शरभंग प्रसंग