जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता

चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ ४ ॥

अर्थ

जिस पर्वत पर हनुमानजी पैर रखकर चले (जिस पर से वे उछले), वह तुरंत ही पाताल में धँस गया। जैसे श्रीरघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमानजी चले।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमानजी का लंका प्रस्थान, सुरसा परीक्षा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी का लंका प्रस्थान, सुरसा परीक्षा और छाया-ग्राहिणी राक्षसी वध का वर्णन है।

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हनुमानजी का लंका प्रस्थान, सुरसा परीक्षा