बदन पइठि पुनि बाहेर आवा
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा
चौपाई ६, दोहा २ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ ६ ॥
अर्थ
और वे उसके मुँह में घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [उसने कहा--] मैंने तुम्हारी बुद्धि-बल का मर्म पा लिया, जिसके लिये देवताओं ने मुझे भेजा था।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “हनुमानजी का लंका प्रस्थान, सुरसा परीक्षा” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी का लंका प्रस्थान, सुरसा परीक्षा और छाया-ग्राहिणी राक्षसी वध का वर्णन है।
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हनुमानजी का लंका प्रस्थान, सुरसा परीक्षा