तारा बिकल देखि रघुराया
तारा बिकल देखि रघुराया
चौपाई २, दोहा ११ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥ छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥ २ ॥
अर्थ
तारा को व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। [उन्होंने कहा--] पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु--इन पाँच तत्त्वों से यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “तारा का विलाप, सुग्रीव का राज्याभिषेक” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तारा के विलाप पर श्रीराम के उपदेश, सुग्रीव का राज्याभिषेक और अंगद को युवराज पद का वर्णन है।
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तारा का विलाप, सुग्रीव का राज्याभिषेक