उमा राम सम हित जग माहीं

चौपाई १, दोहा १२ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥ सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥ १ ॥

अर्थ

हे पार्वती! जगत् में श्रीरामजी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सब की यह रीति है कि स्वार्थ के लिये ही सब प्रीति करते हैं।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “तारा का विलाप, सुग्रीव का राज्याभिषेक” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तारा के विलाप पर श्रीराम के उपदेश, सुग्रीव का राज्याभिषेक और अंगद को युवराज पद का वर्णन है।

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तारा का विलाप, सुग्रीव का राज्याभिषेक