कनक बरन तन तेज बिराजा
कनक बरन तन तेज बिराजा
चौपाई ४, दोहा ३० के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥ सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥ ४ ॥
अर्थ
उनका सोने का-सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरे पर्वतों के राजा सुमेरु हों। हनुमान् जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा-मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “जांबवंत का हनुमानजी को उत्साहित करना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जांबवंत द्वारा हनुमानजी को उनका अपार बल और सामर्थ्य याद दिलाकर समुद्र लांघने के लिए प्रेरित करने का वर्णन है।
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जांबवंत का हनुमानजी को उत्साहित करना