जो नाघइ सत जोजन सागर
जो नाघइ सत जोजन सागर
चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥ मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥ १ ॥
अर्थ
जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लाँध सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजी का कार्य कर सकेगा। [निराश होकर घबराओ मत] मुझे देखकर मन में धीरज धरो। देखो, श्रीरामजी की कृपा से [देखते-ही-देखते] मेरा शरीर कैसा हो गया (बिना पाँख का बेहाल था, पाँख उगने से सुन्दर हो गया)!
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “जांबवंत का हनुमानजी को उत्साहित करना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जांबवंत द्वारा हनुमानजी को उनका अपार बल और सामर्थ्य याद दिलाकर समुद्र लांघने के लिए प्रेरित करने का वर्णन है।
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जांबवंत का हनुमानजी को उत्साहित करना