श्रीरामगुण का माहात्म्य

इस प्रसंग में श्रीरामजी के करुणा, शील और मर्यादा से पूर्ण दिव्य गुणों की महिमा गाई गई है। उनका स्मरण भक्त के हृदय में श्रद्धा, साहस और भक्ति को दृढ़ करता है।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण १४ / १४

प्रकरण पाठ

छन्द

कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं। त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥ जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई। रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥

अर्थ:

वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्रीरामजी सीताजी को ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुन्दर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीर के चरणकमल का मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है॥

दोहा

भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिंजे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥ ३० (क) ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीर का यश भव (जन्म-मरण)-रूपी रोग की [अचूक] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे।

सोरठा

नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक। सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥ ३० (ख) ॥

अर्थ:

जिनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियों को मारने के लिये बधिक (व्याध) के समान है, उन श्रीराम के गुणों के समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिये।