जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा
चौपाई ४, दोहा २९ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा॥ जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी॥ ४ ॥
अर्थ
ऋक्षराज जाम्बवान् कहने लगे-मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीर में पहले वाले बल का लेश भी नहीं रहा। जब खरारि (खर के शत्रु श्रीराम) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझ में बड़ा बल था।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “जांबवंत का हनुमानजी को उत्साहित करना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जांबवंत द्वारा हनुमानजी को उनका अपार बल और सामर्थ्य याद दिलाकर समुद्र लांघने के लिए प्रेरित करने का वर्णन है।
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जांबवंत का हनुमानजी को उत्साहित करना