चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे
चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥ कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥ २ ॥
अर्थ
मैं उन सब (श्रेष्ठ कवियों) के चरणकमलों में प्रणाम करता हूँ वे मेरे सब मनोरथों को पूरा करें। कलियुग के भी उन कवियों को मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के गुणसमूहों का वर्णन किया है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “कवि वन्दना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा पूर्ववर्ती महाकवियों की वंदना और विनम्र भाव से रघुपति-कथा रचने के संकल्प का वर्णन है।
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कवि वन्दना