कीरति भनिति भूति भलि सोई

चौपाई ५, दोहा १४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥ राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥ ५ ॥

अर्थ

कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गंगा जी की तरह सबका हित करनेवाली हो। श्रीरामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असमंजस है (अर्थात्‌ इन दोनों का मेल नहीं मिलता), इसी की मुझे चिन्ता है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “कवि वन्दना” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा पूर्ववर्ती महाकवियों की वंदना और विनम्र भाव से रघुपति-कथा रचने के संकल्प का वर्णन है।

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कवि वन्दना