होहु प्रसन्न देहु बरदानू

चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥ जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं॥ ४ ॥

अर्थ

आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिये कि साधु-समाज में मेरी कविताका सम्मान हो; क्योंकि बुद्धिमान् लोग जिस कविताका आदर नहीं करते, मूर्ख कवि ही उसकी रचना का व्यर्थ परिश्रम करते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “कवि वन्दना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा पूर्ववर्ती महाकवियों की वंदना और विनम्र भाव से रघुपति-कथा रचने के संकल्प का वर्णन है।

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कवि वन्दना