प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं

दोहा २३ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार। एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार॥ २३ ॥

अर्थ

बड़े ही आनन्दित होकर नगर के सब स्त्री-पुरुष शुभ मङ्गलाचार के साज सज रहे हैं। कोई भीतर जाता है, कोई बाहर निकलता है; राजद्वार में बड़ी भीड़ हो रही है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कैकेयी का कोपभवन में जाना” प्रकरण का दोहा २३ है। इस प्रकरण में मंथरा के दुष्प्रभाव से कुबुद्धि कैकेयी के कोपभवन में जाने और अयोध्या के उत्सव पर संकट की छाया पड़ने का वर्णन है।

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कैकेयी का कोपभवन में जाना