कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी

चौपाई १, दोहा २३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी॥ तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा॥ १ ॥

अर्थ

कुबरी को रानी ने प्राणों के समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धि का बखान किया और बोली--संसार में मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बहे जाती हुई के लिए सहारा हुई है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कैकेयी का कोपभवन में जाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंथरा के दुष्प्रभाव से कुबुद्धि कैकेयी के कोपभवन में जाने और अयोध्या के उत्सव पर संकट की छाया पड़ने का वर्णन है।

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कैकेयी का कोपभवन में जाना