अस अभिलाषु नगर सब काहू
अस अभिलाषु नगर सब काहू
चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता हृदयँ अति दाहू॥ को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई॥ ४ ॥
अर्थ
नगर के सब की ऐसी ही अभिलाषा है। परन्तु कैकेयी के हृदय में बड़ी जलन हो रही है। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता। नीच के मत के अनुसार चलने से चतुराई नहीं रह जाती।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कैकेयी का कोपभवन में जाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंथरा के दुष्प्रभाव से कुबुद्धि कैकेयी के कोपभवन में जाने और अयोध्या के उत्सव पर संकट की छाया पड़ने का वर्णन है।
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कैकेयी का कोपभवन में जाना