राम दरस बस सब नर नारी
राम दरस बस सब नर नारी
चौपाई १, दोहा १८८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी॥ बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं॥ १ ॥
अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के वश में हुए (दर्शन की अनन्य लालसा से) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी जल को तककर [बड़ी तेजी से बावले-से हुए] जा रहे हों। श्रीसीतारामजी [सब सुखों को छोड़कर] वन में हैं, मन में ऐसा विचार करके छोटे भाई सहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न सहित अयोध्यावासियों का वनगमन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न, माताओं, गुरुजन और अयोध्यावासियों के प्रेमपूर्ण वनगमन का वर्णन है।
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भरत-शत्रुघ्न सहित अयोध्यावासियों का वनगमन