सिर धरि बचन चरन सिरु नाई

चौपाई ४, दोहा १८८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई॥ तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू॥ ४ ॥

अर्थ

माता की आज्ञा को सिर पर धरकर और उनके चरणों में सिर नवाकर दोनों भाई रथ पर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसा पर वास करके दूसरा मुकाम गोमती के तीर पर किया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-शत्रुघ्न सहित अयोध्यावासियों का वनगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-शत्रुघ्न, माताओं, गुरुजन और अयोध्यावासियों के प्रेमपूर्ण वनगमन का वर्णन है।

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भरत-शत्रुघ्न सहित अयोध्यावासियों का वनगमन