भुज बल बिपुल भार महि खंडित
भुज बल बिपुल भार महि खंडित
चौपाई ३, दोहा ५१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित॥ रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥ ३ ॥
अर्थ
अपने बाहुबल से पृथ्वी के बड़े भारी बोझ को नष्ट करनेवाले, खर-दूषण और विराध के वध करने में कुशल, रावण के शत्रु, आनन्दस्वरूप, राजाओं में श्रेष्ठ और दशरथ के कुलरूपी कुमुदिनी के चन्द्रमा श्रीरामजी! आपकी जय हो।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “नारद की स्तुति और प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवर्षि नारद द्वारा श्रीराम के दर्शन, स्तुति-गान और ब्रह्मलोक प्रस्थान का वर्णन है।
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नारद की स्तुति और प्रस्थान