त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी
चौपाई १, दोहा १२ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ १ ॥
अर्थ
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं--हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-त्रिजटा संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता और त्रिजटा के संवाद तथा शुभ स्वप्न द्वारा आशा का संचार का वर्णन है।
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श्रीसीता-त्रिजटा संवाद