कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका
सोरठा १२ · सुन्दरकाण्ड
सोरठा पाठ
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब। जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ १२ ॥
अर्थ
तब हनुमानजी ने हृदय में विचार कर [सीताजी के सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अंगार दे दिया। [यह समझकर] सीताजी ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-त्रिजटा संवाद” प्रकरण का सोरठा १२ है। इस प्रकरण में सीता और त्रिजटा के संवाद तथा शुभ स्वप्न द्वारा आशा का संचार का वर्णन है।
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श्रीसीता-त्रिजटा संवाद