कह सीता बिधि भा प्रतिकूला
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला
चौपाई ४, दोहा १२ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥ ४ ॥
अर्थ
सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं--[क्या करूँ] विधाता ही प्रतिकूल हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाश में अंगारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वी पर एक भी तारा नहीं आता।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीसीता-त्रिजटा संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता और त्रिजटा के संवाद तथा शुभ स्वप्न द्वारा आशा का संचार का वर्णन है।
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श्रीसीता-त्रिजटा संवाद