कंप न भूमि न मरुत बिसेषा
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा
चौपाई १, दोहा १४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी॥ १ ॥
अर्थ
न भूकम्प हुआ, न बहुत जोर की हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रों से देखा। [फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े ?] सभी अपने-अपने हृदय में सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ !
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “राम के बाण से रावण का मुकुट गिरना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के बाण से रावण के मुकुट और छत्र के गिरने तथा उसके अभिमान के भंग होने का वर्णन है।
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राम के बाण से रावण का मुकुट गिरना