बाजहिं ताल मृदंग अनूपा
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा
चौपाई ४, दोहा १३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥ ४ ॥
अर्थ
हे देवताओं के सम्राट् ! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं। वही मधुर [गर्जन] ध्वनि है। रावण का अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उस पर बाण का सन्धान किया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “राम के बाण से रावण का मुकुट गिरना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के बाण से रावण के मुकुट और छत्र के गिरने तथा उसके अभिमान के भंग होने का वर्णन है।
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राम के बाण से रावण का मुकुट गिरना