दसमुख देखि सभा भय पाई

चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही॥ २ ॥

अर्थ

सभा को भयभीत देखकर रावण ने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे- सिरों का गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुट का गिरना अपशगुन कैसा ?

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “राम के बाण से रावण का मुकुट गिरना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के बाण से रावण के मुकुट और छत्र के गिरने तथा उसके अभिमान के भंग होने का वर्णन है।

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राम के बाण से रावण का मुकुट गिरना