सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू
चौपाई १, दोहा ५५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥ सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥ १ ॥
अर्थ
[शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! सुनो, [प्रलयकालमें ] जिन (शेषनाग)-के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [जीव] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है ?।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, शक्ति का प्रहार” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध और मेघनाद की शक्ति से लक्ष्मणजी का मूर्च्छित होना का वर्णन है।
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लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, शक्ति का प्रहार