यह कौतूहल जानइ सोई
यह कौतूहल जानइ सोई
चौपाई २, दोहा ५५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥ संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥ २ ॥
अर्थ
इस लीलाको वही जान सकता है जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो। सन्ध्या होनेपर दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ीं; सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, शक्ति का प्रहार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध और मेघनाद की शक्ति से लक्ष्मणजी का मूर्च्छित होना का वर्णन है।
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लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, शक्ति का प्रहार