बालि परम हित जासु प्रसादा

चौपाई १०, दोहा ७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा॥ सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥ १० ॥

अर्थ

हे श्रीरामजी! बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपा से शोक का नाश करनेवाले आप मुझे मिले; और जिसके साथ अब स्वप्न में भी लड़ाई हो तो जागने पर उसे समझकर मन में संकोच होगा [कि स्वप्न में भी मैं उससे क्यों लड़ा]।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव का वैराग्य” प्रकरण का चौपाई १०, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव के वैराग्य और प्रभु-शरण के संकल्प का जागरण का वर्णन है।

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सुग्रीव का वैराग्य