जो कछु कहेहु सत्य सब सोई

चौपाई १२, दोहा ७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥ नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत॥ १२ ॥

अर्थ

तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है; परन्तु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता (अर्थात् बालि मारा जायगा और तुम्हें राज्य मिलेगा)। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि—] हे पक्षियों के राजा गरुड़! नट (मदारी) के बंदर की तरह श्रीरामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “सुग्रीव का वैराग्य” प्रकरण का चौपाई १२, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुग्रीव के वैराग्य और प्रभु-शरण के संकल्प का जागरण का वर्णन है।

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सुग्रीव का वैराग्य