पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता
चौपाई १, दोहा १५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥ मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥ १ ॥
अर्थ
फिर मैं सरस्वतीजी और सरिता (गंगा) की वन्दना करता हूँ। दोनों पवित्र और मनोहर चरित्रवाली हैं। एक (गंगा जी) स्नान करने और जल पीने से पापों को हरती हैं और दूसरी (सरस्वतीजी) गुण और यश कहने और सुनने से अज्ञान का नाश कर देती हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “वाल्मीकि, शिव-पार्वती आदि वन्दना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, शिव-पार्वती सहित समस्त पूज्य शक्तियों की वन्दना का वर्णन है।
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वाल्मीकि, शिव-पार्वती आदि वन्दना