बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित
सोरठा १४ (ङ) · बालकाण्ड
सोरठा पाठ
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस। जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥ १४ (ङ) ॥
अर्थ
मैं चारों वेदों की वन्दना करता हूँ, जो संसारसमुद्र के पार होने के लिये जहाज के समान हैं तथा जिन्हें श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करते स्वप्न में भी खेद (थकावट) नहीं होता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “वाल्मीकि, शिव-पार्वती आदि वन्दना” प्रकरण का सोरठा १४ (ङ) है। इस प्रकरण में वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, शिव-पार्वती सहित समस्त पूज्य शक्तियों की वन्दना का वर्णन है।
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वाल्मीकि, शिव-पार्वती आदि वन्दना