भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती

चौपाई ५-६, दोहा १५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥ जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥ होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥ ५-६ ॥

अर्थ

मेरी कविता श्रीशिवजी की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारागणों के सहित चन्द्रमा के साथ रात्रि शोभित होती है। जो इस कथा को प्रेमसहित एवं सावधानी के साथ समझ-बूझकर कहेंगे-सुनेंगे, वे कलियुग के पापों से रहित और सुन्दर कल्याण के भागी होकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के प्रेमी बन जायेंगे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “वाल्मीकि, शिव-पार्वती आदि वन्दना” प्रकरण का चौपाई ५-६, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, शिव-पार्वती सहित समस्त पूज्य शक्तियों की वन्दना का वर्णन है।

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वाल्मीकि, शिव-पार्वती आदि वन्दना