हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं
चौपाई ३, दोहा २४८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि प्रसून अपछरा गाईं॥ पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला॥ ३ ॥
अर्थ
देवताओं ने हर्षित होकर नगाड़े बजाये और पुष्प बरसाकर अप्सराएँ गाने लगीं। सीताजी के करकमलों में जयमाला सुशोभित है। सब राजा चकित होकर अचानक उनकी ओर देखने लगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीताजी का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का सखियों सहित यज्ञशाला में प्रवेश और उनके अलौकिक सौंदर्य से सभी के मोहित होने का वर्णन है।
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श्रीसीताजी का यज्ञशाला में प्रवेश